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तैमूर के ज़ुल्म की कहानियां, चार दिन में ख़ून से रंग डाला सारा शहर



तैमूर के ज़ुल्म की कहानियां, चार दिन में ख़ून से रंग डाला सारा शहर
चंगेज़ और तैमूर में एक बड़ा फ़र्क़ था. चंगेज़ के क़ानून में सिपाहियों को खुली लूट-पाट की मनाही थी। लेकिन तैमूर के लिए लूट और क़त्लेआम मामूली बातें थीं। आइए जानते है उन तीन महीनों में क्या हुआ जब तैमूर भारत में था।
विश्व विजय के चक्कर में तैमूर सन 1398 ई. में अपनी घुड़सवार सेना के साथ अफगानिस्तान पहुंचा. जब वापस जाने का समय आया तो उसने अपने सिपहसालारों से मशविरा किया और…

कौन था तैमूर लंग?

उसकी गणना संसार के महान्‌ और निष्ठुर विजेताओं में की जाती है. तैमूर लंग अथवा ‘तैमूर’ (1336 ई. – 1405 ई.) चौदहवीं शताब्दी का एक शासक, जिसने महान तैमूरी राजवंश की स्थापना की थी। तैमूर 1369 ई. में समरकंद के अमीर के रूप में अपने पिता के सिंहासन पर बैठा और इसके बाद ही विश्व-विजय के लिए निकल पड़ा। मेसोपोटामिया, फ़ारस और अफ़ग़ानिस्तान को विजित कर 1398 ई. में उसने अपनी विशाल अश्व सेना के साथ भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली तक बढ़ आया।

तैमूर का हिंदुस्तान पर आक्रमण

हिंदुस्तान उन दिनों काफ़ी अमीर देश माना जाता था. हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली के बारे में तैमूर ने काफ़ी कुछ सुना था. यदि दिल्ली पर एक सफल हमला हो सके तो लूट में बहुत माल मिलने की उम्मीद थी.
पानीपत के पास निर्बल तुगलक सुल्तान महमूद ने 17 दिसम्बर को 40,000 पैदल 10,000 अश्वारोही और 120 हाथियों की एक विशाल सेना लेकर तैमूर का मुकाबला किया लेकिन बुरी तरह पराजित हुआ। भयभीत होकर तुगलक सुल्तान महमूद गुजरात की तरफ चला गया और उसका वजीर मल्लू इकबाल भागकर बारन में जा छिपा। दूसरे दिन तैमूर ने दिल्ली नगर में प्रवेश किया।

उसके सामने कोई टिक नहीं पाता था

तब दिल्ली के शाह नसीरूद्दीन महमूद के पास हाथियों की एक बड़ी फ़ौज थी, कहा जाता है कि उसके सामने कोई टिक नहीं पाता था. साथ ही साथ दिल्ली की फ़ौज भी काफ़ी बड़ी थी. तैमूर ने कहा, बस थोड़े ही दिनों की बात है अगर ज़्यादा मुश्किल पड़ी तो वापस आ जाएंगे. मंगोलों की फ़ौज सिंधु नदी पार करके हिंदुस्तान में घुस आई. रास्ते में उन्होंने असपंदी नाम के गांव के पास पड़ाव डाला. यहां तैमूर ने लोगों पर दहशत फैलाने के लिए सभी को लूट लिया और सारे हिंदुओं को क़त्ल का आदेश दिया.

उनके सारे घर जला डाले गए

पास ही में तुग़लकपुर में आग की पूजा करने वाले यज़दीयों की आबादी थी. आजकल हम इन्हें पारसी कहते हैं. तैमूर कहता है कि ये लोग एक ग़लत धर्म को मानते थे इसलिए उनके सारे घर जला डाले गए और जो भी पकड़ में आया उसे मार डाला गया.
फिर फ़ौजें पानीपत की तरफ़ निकल पड़ीं. पंजाब के समाना कस्बे, असपंदी गांव में और हरियाणा के कैथल में हुए ख़ून ख़राबे की ख़बर सुन पानीपत के लोग शहर छोड़ दिल्ली की तरफ़ भाग गए और पानीपत पहुंचकर तैमूर ने शहर को तहस-नहस करने का आदेश दे दिया.

तैमूर के पास कोई एक लाख हिंदू बंदी

रास्ते में लोनी के क़िले से राजपूतों ने तैमूर को रोकने की नाकाम कोशिश की. अब तक तैमूर के पास कोई एक लाख हिंदू बंदी थे. दिल्ली पर चढ़ाई करने से पहले उसने इन सभी को क़त्ल करने का आदेश दिया. यह भी हुक्म हुआ कि यदि कोई सिपाही बेक़सूरों को क़त्ल करने से हिचके तो उसे भी क़त्ल कर दिया जाए.
अगले दिन दिल्ली पर हमला कर नसीरूद्दीन महमूद को आसानी से हरा दिया गया. महमूद डर कर दिल्ली छोड़ जंगलों में जा छिपा. दिल्ली में जश्न मनाते हुए मंगोलों ने कुछ औरतों को छेड़ा तो लोगों ने विरोध किया. इस पर तैमूर ने दिल्ली के सभी हिंदुओं को ढूंढ-ढूंढ कर क़त्ल करने का आदेश दिया.

चार दिन में सारा शहर ख़ून से रंग गया

अब तैमूर दिल्ली छोड़कर उज़्बेकिस्तान की तरफ़ रवाना हुआ. रास्ते में मेरठ के किलेदार इलियास को हराकर तैमूर ने मेरठ में भी तकरीबन 30 हज़ार हिंदुओं को मारा. यह सब करने में उसे महज़ तीन महीने लगे. इस बीच वह दिल्ली में केवल 15 दिन रहा.

भारत में केवल लूट के लिये

तैमूर भारत में केवल लूट के लिये आया था। उसकी इच्छा भारत में रहकर राज्य करने की नहीं थी। अत: 15 दिन दिल्ली में रुकने के बाद वह स्वदेश के लिये रवाना हो गया। 9 जनवरी 1399 को उसने मेरठ पर चढ़ाई की और नगर को लूटा तथा निवासियों को कत्ल किया। इसके बाद वह हरिद्वार पहुँचा जहाँ उसने आस पास की हिंदुओं की दो सेनाओं को हराया। शिवालिक पहाड़ियों से होकर वह 16 जनवरी को कांगड़ा पहुँचा और उसपर कब्जा किया। इसके बाद उसने जम्मू पर चढ़ाई की। इन स्थानों को भी लूटा खसोटा गया और वहाँ के असंख्य निवासियों को कत्ल किया गया। इस प्रकार भारत के जीवन, धन और संपत्ति को अपार क्षति पहुँचाने के बाद 19 मार्च 1399 को पुन: सिंधु नदी को पार कर वह भारतभूमि से अपने देश को लौट गया।

पैशाचिक क्रूरता में अव्वल

चंगेज़ ख़ाँ और उसके मंगोल भी बेरहम और बरबादी करने वाले थे, पर वे अपने ज़माने के दूसरे लोगों की तरह ही थे। लेकिन तैमूर उनसे बहुत ही बुरा था। अनियंत्रित और पैशाचिक क्रूरता में उसका मुक़ाबला करने वाला कोई दूसरा नहीं था। कहते हैं, एक जगह उसने दो हज़ार ज़िन्दा आदमियों की एक मीनार बनवाई और उन्हें ईंट और गारे में चुनवा दिया। ‘तैमूर लंग’ दूसरा चंगेज़ ख़ाँ बनना चाहता था। वह चंगेज़ का वंशज होने का दावा करता था, लेकिन असल में वह तुर्क था।
भारत से लौटने के बाद तैमूर से सन्‌ 1400 में अनातोलिया पर आक्रमण किया और 1402 में अंगोरा के युद्ध में ऑटोमन तुर्कों को बुरी तरह से पराजित किया। सन्‌ 1405 में जब वह चीन की विजय की योजना बनाने में लगा था, उसकी मृत्यु हो गई।
Source - http://hinduakhbar.com

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